बदलते विचार
क्या मैं लोगों को गंभीरता से लूं, या उनके शब्दों की तह में डूबूं? जब हर पल इंसान बदलता जाता है, विचारों का रंग भी पल में उड़ जाता है। मैंने खुद देखा है ये सारा मंज़र, जहाँ सबसे समझदार भी हो जाते हैं बेअसर। जो कल तक कहते थे सत्य की बात, आज बदल गए हैं, कर रहे नई शुरुआत। वो शब्द, जो कभी पत्थर से लगे, आज उन्हीं से खुद वो पीछे हट चले। मैंने देखा — अपने ही वचनों से मुकरते हुए, बुद्धिमान भी सच्चाई से डरते हुए। विचार हैं लहरों से — बहकते, भटकते, समय की रफ्तार से हर दिन बदलते। जो आज सत्य लगे, कल भ्रम बन जाए, और जो आज झूठ लगे, वही अनुभव बन जाए। तो अब सवाल ये उठता है मुझमें, क्या हर जुबां को बाँध लूं अपने रुख में? या सीखूं कि हर बात है बस उस पल की, ना दिल में उतारूं हर झूठी हलचल की। शब्दों को सुनूं, पर आंखों से परखूं, व्यवहार और नीयत की गहराई में उतरूं। इंसान हूँ — जानता हूँ फ़ितरत बदलती है, मगर सच्चाई पर टिकना ही असली मर्दानगी है। तो हाँ, मैं सुनता हूँ सबको — पर सोचता हूँ अपना, ना हर एक लफ्ज़ को सच का सपना समझता हूँ अपना। मैं, उमंग, अब दिल से यही मानता हूँ, जो आज है, वो कल बदल भी सकता है — और मैं उसके लिए तैयार हूँ।
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