राणा नहीं महाराणा
_जब हम सो जाते हैं मेवाड़ में, राणा गरजते हैं धरती और आसमान में।। जीवन मरण के इस खेल में, अमर है इस जंजाल से। डिगे ना कभी रुके ना कभी, चलते चेतक संग शान से। वो एकलिंग वो माटी वीर, ना फंसा कभी मुगलों के उस जाल में। मेवाड़ी शेर चला भाले संग, चला वीरगति ठान के। हाथी से चींटी लड़ी, इसी वीर हिंदुस्तान में। जब हम सो जाते हैं मेवाड़ में, राणा गरजते हैं धरती और आसमान में।। •युद्ध का चरण🏹:- अब रण में खड़ा है तू राणा, द्वंद कहां तक टाला जाए। आज नहीं तो कल होगा, अब युद्ध कहां तक थामा जाए। चेतक संग चले राणा ना झुके कभी, ना रुके कभी ,ना गिरे किसी अविराम से। मातृभूमि की रक्षा को, चल तु तन मन धन प्राण से। जब हम सो जाते हैं मेवाड़ में, राणा गरजते हैं धरती और आसमान में।। इस रूखे बंजर माटी पर, अब शत्रु से पड़ा है पाला। रण में धनुष बाण चले हैं, तो कभी चले हैं भाला। युद्ध के बीच के तुफान में , सिंह ने हाथी को है गिराया। जो पठान कभी गरजता था, फिर राणा ने अपना रूप दिखाया। जिस पठान का भी राणा से, रण के बीच पड़ा पाला। राणा की तलवार ने उसे, कवच सहित काट डाला। जब हम सो जाते हैं मेवाड़ में, राणा गरजते हैं धरती और आसमान में।। अकबर ने अपनी सेना, भेज दिया मेवाड़ में। दो कदम हिला सिंह, गीदड़ लगे दहाड़ में। चिड़िया लड़ी बाज से, इसी वीर हिंदुस्तान में। सबको भय है अब, शांत सिंह की हुंकार में।
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