‘वो और मैं’
वो टहरा किसी मुकम्मल किनारे–सा, मैं भटका तूफा में उलझी कश्ती–सा। वो गहरा,दुर्गम सिंधु–सा, मैं उथला,निर्जल झरने–सा। वो बिखरा भोर में ओस की बूंदों–सा, मैं बना लुटेरा सूरज की किरणों–सा। वो उमड़ता है सावन के बादल–सा, मैं सुख प्यासा हूं, रेत के टीलो–सा। वो बहती जलती सतरंगी राहों–सा, जहां मैं खामोश खड़ा किसी नुक्कड़ के खांबे–सा। वो खुशहाल आंगन की तुलसी–सी, मैं सुनसान खड़ा रेगिस्तान की झाड़ी–सा। वो आबाद,अनोखी,मनमोहक मुस्कान–सी, मैं फीका उड़ता तस्वीरों के रंगों–सा। वो अनुपम चांद की चंचल किरणों–सा, मैं सुनसान जहां का दुर्गम टूटे तारे–सा। वो अद्भुत गहरा राज किसी कहानी–सा, मैं बिखरा चारों–ओर खुली किताबें–सा!! कवि– राजू गुजराती
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