शेखर
सफर में हूं या भटक गया हूं मैं वक्त के थपेड़ों से फिसल गया हूं मैं जाना था कहीं और जाता कहीं और हूं तेज जीवन धारा में कहां बहता रहा हूं मैं । विभ्रम है या सत्यता जो महसूस होता है शेखर आंखों से धीरे-धीरे ओझल होता है उफ ये थकान ये बोझिलता और निराशा भी आत्म बाह्य संघर्षों से नीत हारता रहा हूं मैं। कुछ तो खोया है कुछ छुटा है कुछ बाकी है अभी नीत नए उलझनों के मकरजाल में उलझता रहा हूं मैं परिस्थितियों और मन के बीच घोर संघर्ष चलता है इस तपते दुपहरी में मंजिल हाथों से फिसलता है । चलो धाराओं को ही पतवार बनाते हैं प्रतिकूलता को अनुकूलता मानते हैं ये थपेड़े कहीं तो पहुंचाएंगे ही एक दिन बस इतना वादा खुद से की पहुँचेंगे एक दिन ।
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