नहीं रही कोई आशा
जब मन भरता है, रिश्तों में धुंध छा जाती है, दिखावे की चादर ओढ़कर, वो बातें बदल जाती हैं। अंदर से खाली, पर चेहरे पर मुस्कान, ऐसा लगता है जैसे, सब कुछ है कुर्बान। वो बातें करेगा, जो चुभें दिल में, झूठे वादों की लहर, बहाएगी फिर दिल में। सिर्फ खेलना चाहता है वो, इश्क की आग से, बिछड़े पलों का नहीं, अब कोई नाम ले। वक्त के साथ प्यार का रंग फीका पड़ेगा, उसकी नजरों में अब मेरा कोई मतलब न रहेगा। समझने की कोशिश में, मैं खुद को खो दूंगी, वो कहेगा मुझे गलत, और मैं बस उसकी राह देखूंगी। दूरी के इस सफर में, कब खत्म होंगे ये पल, बस एक दिखावा रहा, अब दिल में न कोई जल। जब मन भरता है, तब रिश्ते की परिभाषा बदल जाती है, दिखावा और सच्चाई की ये दुश्वारी ही तो है।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
