विधा:-दोहा मुक्तक
विषय:वर्षा में किसान और वियोगिनी लगे कृषक सब नाचने, जगी फसल की आस। बरसा भारी देखकर, मन में अति उल्लास।। हर्षित किसान झूमते, नाचे मन का मोर। बिचड़ा बुनने के लिए, चले खेत की ओर।। पिया गए परदेश में, हृदय नहीं उल्लास। है तङपती वियोगिनी, वृष्टि लगे बकवास।। मेघ नीर बरसा रहा, बिजली कड़के जोर। रह-रह उसका मन डरे, दादुर करता शोर।। नहीं संग है प्राण पति, प्रिया बहाये नीर। सावन लगता कष्ट कर, सहे वेदना पीर।। नरेन्द्र सिंह, 22.06.2025
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