राधा
राधा की अंखियों में छवि प्रीतम की, प्रीत-प्रेम प्रवाहित रासेश्वरी के अस्तित्व में, राग-मधुरिमा संचित रम्या में, सृष्टिसंचालक भी समर्पित कृष्णमत्राधिदेवता में, सर्व कर्मवानों की श्रद्धा सर्वाद्या में, समस्त जग की आराधना सर्ववंद्या में, प्रत्येक शोक का अंत वृन्दावनविहारिणी में, जग रुपी वृदांवन निहित वृन्दाराध्या में, सर्व सुखों और आंनद का जन्म रमा में, श्रेष्ठ और पूज्य भाव अशेषगोपीमण्डलपूजिता में, जीवन रुपी सत्य का समागम सत्या में, प्रत्येक सत्य परे सत्यपरा में, निडरता युक्त सौंदर्य सत्यभामा में, कृष्ण का दिव्य समर्पित प्रेम श्रीकृष्णवल्लभा में, पिता समान निर्णय क्षमता वृषभानुसुता में, सरल, दिव्य और शुद्ध भाव गोपी में, श्रष्टि की अनंनता मूल प्रकृति में, सभी ईश्वरों सी ईश्वरता ईश्वरी में, संगीत का प्रत्येक सुर,राग गान्धर्वा में, रचनात्मकता और उदारता राधिका में, आंतरिक प्रसन्नता का स्त्रोत आरम्या में, प्रेम की परिकाष्णा रुक्मिणी में, परमेश्वर का अस्तित्व व्याप्त परमेश्वरी में, जीवन के प्रत्येक कला भी परे परात्परतरा में, पूर्णता का उद्गम और विलय पूर्णा में, चन्द्र की सारी विधाएं और कलाएं पूर्णचन्द्रविमानना में, भोग और मोक्ष की कला भुक्ति-मुक्तिप्रदा में, ऐश्वर्य और संकट मुक्ति भवव्याधि-विनाशिनी में, प्रेम में राधा, राधा में प्रेम।
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