खामोश सी
खामोश सी कलम सिसकती जा रही थी, देख कर उस लड़की की हालत मातम मना रही थी, चीख चीख कर कलम सबको बता रही थी, यह दुनियां कैसे उसके दर्द पर मुस्कुरा रही थी...! सर झुका कर वो लड़की न जाने क्या क्या छुपा रही थी, दुनियां की कुरीतियों के सामने चुप सी हुए जा रही थी, खामोशी उसकी चीख चीख कर बता रही थी, कैसे वो अपने हालात छुपा रही थी...! कैसे समाज में वो वक्त बिता रही थी, इन दरिंदों के बीच वो खुद को अकेला पा रही थी, इज्जत बचाने की खातिर खुद को मिटा रही थी, फिर न लड़की बनाना भगवान से गुहार लगा रही थी...! बस कुछ इस तरह वो हमेशा के लिए खामोश हुए जा रही थी, दूर खड़ी कलम लिखते लिखते आंसू बहा रही थी। विश्वकर्मा
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