दुख बयां
गुजारे कई दिन माह साल, जो न कटे वो रात हूं मैं, लगा तनहा सा जो महफ़िल उसमे अपने पन का एहसास कराऊं, वो साथ हूं मैं बीते बात, गुफ्तगू औरों के संघ पर लगी जो दिलो पे, वो बात हूं मैं, गुजारे हसीन पल पर बहुत, भुला न पाओगे, वो याद हूं मैं भोगी बताए औरों वो एक अंदाज हूं मैं देखो हसरत भरी असमा में वो अनन्त फैली, बाहर हूं मैं, की होगी खुश होनी की कोशिश पर बीते दुख मिटा न पाओगे वो बीते लम्हाभारी सांस हूं मैं।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
