कुछ अनसुना सा.....!!
कुछ कहना था उसको पर ना जाने क्यों चुप रहती थी, हर दिन चुपके चुपके धीरे धीरे रोया करती थी कुछ सहमी सी, कुछ थकी सी, मरने का सोचा करती थी, फिर न जाने क्या आता दिल में वापस उठकर लड़ती थी, घर की दीवारें जेल जैसी लगती थी, कुछ अपनापन अपनों में ढूंढते ढूंढते गैरों से बाते करने लगती थी, छोटी छोटी बातों में खुशियां ढूंढ लेती वो जिंदगी से हर रोज लड़ती थी, सारी बंदिशों के बाद भी सबकी फिक्र करती थी, फिर भी किस्मत को रास ना आई, मानसिक अस्थिरता से हार गई वो , धीरे धीरे हौले हौले वो फिर गिरने लगती थी, जाने क्या कहना था उसको आखिर वो क्यों चुप रहती थी।।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
