रूह की उलझन
दिल नहीं लगता हैं अब ख़ुद को समझाने में.. शायद थक चुकी हुं ख़ुद को मनाने में.. दूसरों की ख्वाहिशे पुरी करते करते जिंदगी यूं ही गुज़रते.. दिमाग़ भी थक चुका हैं दिल को बारंबार सुधारते.. दिमाग़ से फ़ैसला लेना बंद कर दिया हैं मैंने क्योंकि दिल की बात सिर्फ़ दिल ही जाने.. दिमाग़ बोलता कुछ और हैं दिल करता कुछ और हैं इन्हीं दो राहों में उलझकर रूह अधूरी सी रह गई हैं..।।
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