झालावाड़ स्कूल हादसा
कड़कती धूप में एक सपना सेका था, दे बस्ता मां ने मुझे, पढ़ने भेजा था, मुझ अबोध पर कहर गुजार गई ’छत’ पंख दिए ही थे, सपनो को, मैंस अभी उड़ना सिखा ही था , क्या पता था, सपनो की इमारत को इतना जर्जर पाऊंगा, पंख सिकुड़, चंद पत्थरों के नीचे सिमट कर रह जाऊंगा!
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