जाति क्यों नहीं जाती।
आज सुनाता हु आपको किस्सा मेरे बचपन का, चेहरे पे मुस्कान रखकर ढोंग करते सब अपनेपन का, एक स्कूल में पढ़ते एक साथ खेला करते थे, पर घर आकर वो बड़ो से ऊंच नीच के किस्सा सुना करते थे। पानी सबमें एक है उस बात पर क्या थी हानि, सबके लिए अलग हमारे लिए अलग मटके में रखते थे पानी। पानी तो बस पानी है फिर भी पानी का खेल है, शक्ल सूरत एक जैसी फिर न कोई मेल है। ये है जीवन का एक छोटा सा किस्सा, उनके लिए जाति मेरी जैसे सुंदर चेहरे पे एक भद्दा मस्सा। छोटा सा गांव , गांव में सबके नाम फिर भी नाम से न जाने जाते थे, समाज के ठेकेदारों ने ऐसा यत्न किया , जाति से पहचाने जातें थे। शक्तिमान देखने उनके घर जाया करते थे, बाकी सब चारपाई पर, जमीन पर हमे बैठाया करते थे। घने वन में एक हरित वृक्ष के होते समान डाल पात है, लाल रक्त से संचित सब मनुष्य , फिर बीच में आती क्यों जात पात है। न एक पल मिला सम्मान ,पग पग पर व्यवहार हुआ अभद्र, नाम से कभी जाना न गया पुकारते कहके दलित और शुद्र। एक खुद को बताकर ऊंच जात , करते सब पर राज, दलित पिछड़े सेवा करते , करते उनके सब काज। जब जब कोशिश की सिर उठाने की तब तब धर्म ने दी चौखट पर दस्तक, बंद किए स्कूल के रस्ते हाथ न लगने दी कोई पुस्तक। समय बदला साल बदले ना बदले हालात, हर जगह नाम से पहले पूछी जाती है जात। धर्म के शस्त्र ने कुछ ऐसे दिखाया आवेश, कुओं से पानी न मिला, न मिला मंदिरो
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