आत्मा।
मुट्ठी में स्वप्नि आकाश लिए बेटी तो पैदा कर लूं मैं, हर एक मर्द से हारी हूँ कैसे धीरज धर लूं मैं। कुछ कोख में मारी जाती है कुछ जन्मोपरांत मर जाती है जब रखा जाता है अशिक्षित जीवन भर सताई जाती है, कुछ दहेज प्रथा से मर जाती कुछ जिंदा जला दी जाती है कुछ तीन तलाक के कहर तले, खूनी आँसू बहाती है कुछ नामर्दों के एसिड से चेहरे की आब गंवाती है घुट-घुट कर जीवन जी कर आखिर अबला बन जाती है मर्दो की नपुंसकता देखो बलात्कारी बन कहर ढहाते है अपमानित कर नारी जाती को जला जिंदा मार जाते है नहीं सुरक्षित इस कलयुग में नारी का अस्तित्व यहाँ अब मन करता खोल कोख बेटी को अंदर कर लूं मैं हर एक मर्द से हारी हूँ कैसे धीरज धर लूं मैं। मुट्ठी में स्वप्नि आकाश लिए बेटी तो पैदा कर लूं। हर एक मर्द से हारी हूँ कैसे धीरज धर लूं मैं।
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