कैसे सो जाऊँ
कैसे सो जाऊँ, अभी तो बहुत पढ़ना है रात का सन्नाटा गहरा छाया, खिड़की से चाँद मुझे समझाया। "थोड़ा आराम भी ज़रूरी है, थके कदमों को राहत पूरी है।" पर दिल ने मुझसे ये कह डाला, "अभी नहीं, अभी है उजाला। सपनों की राहें खुद बनानी हैं, रुक मत, मंज़िल तक जानी है।" किताबों के पन्ने मुझे बुलाते, नए नए सवालों में उलझाते। एक हल निकले, फिर दूजा आए, मन में बस प्रश्नों की धुन समाए। आँखें बोझिल, पर हिम्मत कायम, ज़िद्द है, मेहनत का दीप जलाए। रात भले ही लंबी हो जाए, पर जीत मेरी ही कहलाए। सोऊँगा तब, जब सफर मुकम्मल होगा, जब सपनों का हर हिस्सा हासिल होगा। अभी नहीं, अभी तो पढ़ना है, खुद को नई ऊँचाइयों तक गढ़ना है!
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