कुण्डलिया
अतरी की ये वादियाँ, घेरे गिरि चहुँओर। जलद छुए गिरि श्रृंग जब, नाचे मन का मोर ।। नाचे मन का मोर, बहे जब-जब पुरवाई। आनंदित हो लोग, करे उसकी अगुआई।। अद्भुत मोहक दृश्य, बने जब बादल छतरी । लगे सुहाना क्षेत्र, पूज्य है धरती अतरी।। नरेंद्र सिंह
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