"अंतिम वसीयत: एक अधूरी रूह की"
मेरे वजूद के हर टुकड़े पर उसका नाम लिखा है, पर उसकी जुबां पर मेरा ज़िक्र तक हराम लिखा है। मैंने तो मांगी थी एक बूंद वफ़ा की उनसे, पर मेरी किस्मत के प्याले में ज़हर-ए-जाम लिखा है। वो जो मेरी रूह की परछाई हुआ करते थे, आज वो मेरे जनाज़े को देख कर रास्ता बदलते हैं। मेरी सिसकियों से जिन्हें नींद नहीं आती थी कभी, आज वो मेरी कब्र पर गैरों के साथ टहलते हैं। इतना भी कोई पत्थर दिल न हो इस जहाँ में, कि मरने के बाद भी वो मेरी लाश से हिसाब मांगते हैं। मिटा दिया है मुझे खाक में मिला कर भी जिन्होंने, वही अब मेरी बर्बादी का मुझसे ख़िताब मांगते हैं। अब तो साँस लेना भी जैसे एक गुनाह लगता है, ये सीना अब दिल नहीं, दर्द की पनाह लगता है। दफ़न कर दो मुझे कि अब ये तमाशा ख़त्म हो, क्योंकि अब ये ज़िंदा रहना भी एक सज़ा लगता है।
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