कब बीत गई जिन्दगी
सोचा था संवार लेंगे, आए बड़े बड़े सपने मन में, न जानें कहा कब कैसे खोए, तुझको संवारते निखारते जिन्दगी, पता नही कब बीत गई जिन्दगी। बीते दिन महीने साल, बीत गए कई दशक, न जानें कितने और बीतेंगे थी मेरे पास पर, पाना चाहा राह भर पता नही कब बीत गई जिन्दगी। क्यों न लगता देर इतना, थे बनाए तेरे मोहरे हम , संभाल होस तो संभालते रह गए, लगाए आस तो लगाए रह गए, बताए क्या इस भगदड़ से राह में, कब बीत गईं जिन्दगी। सब पाने की भूख थी, कर जाने की जिद थी, तब याद न आई जिन्दगी, वो भूख भूख ही रह गईं, कहां, कब बीत गई जिन्दगी।
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