क्यूं महकी वो कली.....!!
एक कली खिली थी चुपके से, संजोए हुए बहुमूल्य सौंदर्य , फिर धीरे धीरे वो फूल बनी, लिए हुए अदभुत सुगंध, उसे नजर लगी अचंभे से, फिर बच ना सकी वो अधिक समय, एक शख्स हुआ है मोहित उस पर, महक फूल की ऐसी भायी , उस शख्स को न तनिक दया आई, तब तोड़ा उसे निर्दयता से, एक पल में अलग किया पौधे से , कुछ समय बिताया उसके साथ, पहले सहलाया प्यार से, फिर किया संतुष्ट अपने मन, जब तक महक ना चली गई, जैसे ही बीता कुछ और समय, फिर किया चूर चूर उस फूल को, तोड़ डाला उसे टुकड़ों में, कुछ फेंक दिया था सड़कों पर, कुछ पांवों से था मसल दिया, फिर चला गया अपने घर को, शायद दुहराए ये सारा कुछ, फिर ऐसा ही करेगा वो कल को।।
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