मन
विचलित मन बस विश्राम चाहता है, भीड़ का साथ नहीं, सुकून की छांव चाहता है। जितना सोचोगे उतना उलझायेगा ये मन, जितना भटकोगे उतना ही डगमगायेंगे कदम, तत्पश्चात् रुको , सोचो और सब्र रखो, जिंदगी इक दिन जरूर खिलखिलायेंगी , अपनो का साथ पाकर गुनगुनाएगी, सुख, शांति और तृप्ति से जगमगाएगी। यह अब परिश्रम के पथ पे मुकाम चाहता है विचलित मन बस विश्राम चाहता है, भीड़ का साथ नहीं, सुकून की छांव चाहता है। मंजिल बेशक मुश्किल है कठिन है ये रास्ते, पाने की खातिर में सफलता, कभी सोते है तो कभी है जागते, रास्ते खुद बनते है मंजिल से, तुम अपनी धुन में चलते जाओ, सफलता चूमेगी कदम तुम्हारी तुम धैर्य रखो और आगे बढ़ते जाओ। मंजिल बेशक अदृश्य हो, इसको पाने की आस चाहता है विचलित मन अब विश्राम चाहता है, भीड़ का साथ नहीं, सुकून की छांव चाहता है।।
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