प्रेम की आग
प्रेम की आग है, ये कैसी अजब सी ज्वाला है, तन को नहीं जलाती, पर मन को पिघला देती है। शांत लहरों में भी ये एक तूफ़ान सा लाती है, हर धड़कन में बस एक ही नाम दोहराती है। हर पल सुलगती है, न बुझती है, न राख होती है, ये विरह की तपस्या है, कभी न शांत होती है। जब ये लपट उठे, तब दुनिया सुहानी सी लगे, हर गीत, हर फ़साना, एक अमर कहानी लगे। इसमें जलने का भी एक अनोखा मज़ा है, ये प्रेम की तपन ही, जीवन की सजा है। कभी ये मासूम है, जैसे कोई दीया बुझा-बुझा सा है, कभी ये उग्र सा है, जैसे कोई तीव्र एक पूजा है। इस आग की गरमाहट में ही कही चैन मिलता है, जहाँ रूह समर्पित हो, वहीं मिलन खिलता है। तो जलने दे मुझको, इस पावन सी अग्नि में, ये प्रेम की आग है, बस तू ही मेरी सृष्टि मैं तू सृष्टि है मेरी, मैं कण हूँ तेरी धूल का, ये प्रेम ही तो सार है, इस जीवन के मूल का। न माँगूँ स्वर्ग कोई, न कोई वैकुंठ मुझे चाहिए, बस तेरी इस आग में, थोड़ा मेरा अस्तित्व चाहिए। हाँ, जलने दे मुझको, इस पावन सी अग्नि में, ये प्रेम की आग है, बस तू ही मेरी सृष्टि है।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
