हरिगीतिका छंद
शीर्षक:राम का सुमिरन करो दशरथ ललन रघुपति भजन कर, रात-दिन सुमिरन करें। आनंद दायक है विधाता, ध्यान अपने मन धरें।। रक्षक वही सबका हमेशा, गान गुण इनका करें। लो प्रेम से प्रभु नाम हरदम, जो सदा संकट हरें।। सुमिरन करो सब राम का ही, तारता अवतार ले। करना भजन तल्लीन होकर,जाप कर हर बार ले।। पीड़ा हरे संकट उबारे, एक ही निष्काम हैं। आते धरा पर बन मनुज ये,राम ही तो श्याम हैं।। वाचाल करता मूक को ये,पंगु भी पर्वत चढ़े। जिसपर कृपा इनकी रही वो, मूढ़ भी रचना गढ़े।। नर मत करो अब देर क्षणभर, मंत्र जप कर राम का। संसार में सब व्यर्थ मानो,मात्र यह है काम का।। नरेन्द्र सिंह,
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
