कविता
जीवन जीने के सलीके*** भले दो रोटी खाने में कम करें, पर कभी भी किसी से कपट मत करें। चाहे जीर्ण पहनने। को कपड़े हों, पर मुँह छिपाने के, नहीं लफड़े हों। ऐश-मौज बेशक जीवन में कम हो, पर कहीं नज़रें मिलाने का दम हो। यह सही जीवन जीने की कला है, इसी में इज्जत,शांति और भला है। उदर तो निरीह ढोर भी भरते हैं, पर जाल-फरेब वे कहाँ करते हैं ? नरेंद्रसिंह 22.11.2024
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