जो अब तुम आई हो…
जब बांधती हो जुल्फों को, लगता है जैसे घटाओं को क़ैद कर लिया हो बस एक पिन से तुमने। जो खोल दो इन्हें, तो लगता है जैसे सदियों बाद बरसेंगी मुझ पर, बिजली बन कर गिरेंगी मुझपर और झुलस जाएंगी मुझे इन घटाओं को क़ैद करने की अदा कहाँ से लाई हो? अब जो आई हो मेरे अरमानों के गुलशन में, तो ठहर क्यों नहीं जाती? जो अब तुम आई हो… अभ्युदय
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