ख़्याल
कभी कभी यु ही, ख़्याल मैं बुनती हु,, हक़ीक़त से ऊपर, सपनो को मैं चुनती हु,, तुझसे हो सुबह, और तुझमें ही ढले शामें मेरी,, बस यही दुआ ,हर रोज़ मैं करती हूँ,, इस भीड़ भरे माहौल से परे, अपनी अलग ही एक दुनिया हों,, सारे गिले शिकवे शिकायतों से परे, सपनों मे भरी हर एक खूबियां हों,, बातों के बीच मन में कुछ भी मयाल ना हों, खुदा करे अधूरा मेरा ये ख़्याल ना हो,.!!!
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