हे नाथ !
मुझे हार मिले या जीत मुझे खुशी मिले या खीज जो भी हो परिणाम मगर प्रयास चले चिर निरंतर। मार्ग कितना भी कंटक हो कदम कदम चाहे संकट हो छिले चाहे तन-मन जीवन पर हिम्मत शेष बचना चाहिए। बाहर कितना भी विष हो द्वेष ईर्ष्या कटुता खूब हो चाहे कितनी भी मजबूरी हो बस प्रेम ही बरसना चाहिए। सामर्थ्य देना मुझे बस इतना कर सकूं परहित चाहे जितना भले अपनी स्थिति फटेहाल हो जन हित खातिर भला हाल हो। अपने चाहे कितना चोटिल करें तन मन मेरा छलनी छलनी करें स्वजन खातिर मेरा सर्वेश्व समर्पण कभी मेरा मन नहीं बदलना चाहिए। हे नाथ! मुझे वो शक्ति दो अनवरत अपनी भक्ति दो मेरे मानो भाव न बदलें कभी सदा सत्मार्ग पर ही चला करूं।
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