"साँसों का बोझ"
वो कहते थे कि हम धड़कन हैं उनकी, फिर धड़कन को ही तड़पने के लिए छोड़ दिया। जो घर बनाया था अरमानों से हमने मिलकर, उस घर की बुनियाद को ही बेदर्दी से तोड़ दिया। अब तो आईने में खुद को देखूँ तो डर लगता है, जैसे कोई अजनबी मेरी आँखों से रो रहा हो। वो जो मेरे होने से ही खुद को मुकम्मल मानते थे, लगता है आज वो किसी और की बाहों में सो रहा हो। मेरे आँसुओं की कीमत अब बस राख के बराबर है, क्योंकि जलाने वाला भी वही है जिसे मैंने चाहा था। सरेआम नीलाम कर दिया उसने मेरी वफ़ा को, जिसके लिए मैंने ज़माने भर से बैर कमाया था। ए मौत! अब तू ही आकर मुझे गले लगा ले, कि अब सांसों का ये बोझ ढोया नहीं जाता। जिस दिल के हर कोने में बस नाम था उसका, अब उस टूटे हुए दिल से और रोया नहीं जाता।
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