कविता भी मरती है
ऐसा कहा जाता है कि कविता अमर होती है कभी नहीं मरती है, पर यह पूर्ण सत्य नहीं है कविता भी मरती है, कविता की भ्रूणहत्या भी होती है कविता बेमौत भी मरती है जन्म लेते भी मरती है पाठकों की उपेक्षा से भी मरती है, कविता का पाठ न हो, तो भी कविता मरती है। कभी गुनगुनाते गुनगुनाते बाथरूम में शब्दों को पिरोते-पिरोते , कभी मुखड़ा तक आते-आते कभी अंतरा तक आते-आते, कभी दो चार पंक्तियों तक जाते-जाते, कभी कविता बन भी गई पर शीर्षक न पाते-पाते, सचमुच इन हालातों में कविता मर ही जाती है। नरेंद्र सिंह
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