"आत्मसंवाद"
क्यों कायर बन पल काट रहे खुद को हिस्सों में बाँट रहे तिल तिल मरते क्यों मन रोये क्यों जीवन क़ी गरिमा खोये हर पल क्यों पीड़ा सहते हो क्या इसी को जीना कहते हो जो समय हाथ से फिसल रहा क्षण क्षण जीवन को निगल रहा कुछ बूँद बूँद सा छूट रहा भीतर भीतर कुछ टूट रहा न जाने क्या हो ढूंढ रहे खुद से क्यों आँखें मूँद रहे क्या पाओगे इस जीने में गर आग नहीं है सीने में जो दुबक सिमट कर बैठे हो क्या बचा रहे हो बतलाओ गर साँसों का चलना "जीवन" है क्यों जीते हो फिर "मर" जाओ न बातों में गहराई है न जीवन में सच्चाई है न प्रेम खुद ही से करते हो न खुद से ही रुसवाई है क्या टुकड़ों में ही जीना है क्या हर पल यह विश पीना है कब जागोगे हे "कायर" तुम कब तक भागोगे कायर तुम है वक्त तुम्हे ललकार रहा अब उठो विवशता सब त्यागो जिस बेहोशी में लिप्त रहे उस द्विस्वप्न से अब जागो जीवन का "रण" स्वीकार करो चेतन मन का विस्तार करो अपने बंधन तुम पहचानो बेडी काटो, खुद को जानो है हैं कृष्ण तुम्हारे साथ सदा फिर "पार्थ" भला क्यों डरते हो गाँडीव उठा हुंकार भरो क्यों रण में पीछे हटते हो क्यों रण में पीछे हटते हो
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