देवी जी ।
सुनसान राहों पर मैं चला, और चलता ही गया , इन अंधेरों की आगोश में, जेहन में एक सवाल लिए , मैं चलता गया... बार - बार खुद को झकझोरते , पूछता रहा दिल से , बस एक ही सवाल , तुम क्या हो मेरे लिए... मेरे अपरिभाषित अल्फाजों की जज्बात हो या , हमारे इश्क की उभरती आगाज हो तुम। मेरे शब्दों में छुपी एक आवाज हो या, मेरे बेजुबान एहसासों का कोई जवाब हो तुम। मेरे नजरों की तलाश हो या, मेरे बंजर जमीं की आसमां हो तुम । मेरे मरीज - ए - दिल की दवा हो या, इस बंजारे की घर हो तुम। मन बेचैन है जानने को , क्या हो तुम... आखिरकार दिल ने दस्तक दी लफ्जों पे , और आहिस्ते से कहा, इस मतलब की दुनिया में , बेमतलब सा ख्वाब हो तुम देवी जी। (शिवम भारद्वाज)
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