शब्द कुन में "शिव"
शिव निर्वाण से पहले, निर्माण करते हैं मौन में, जहाँ शब्द नहीं, बस शून्य है, और शून्य में ही पूर्णता का जन्म है। निर्माण से पहले होता है विनाश, न बाहरी, न केवल देह का — अहं का, भ्रम का, समय का, जहाँ जलती हैं पहचान की परतें। हर नाश में छिपा है बीज, एक नए संसार का, जो पनपता है अश्रु और तप में, ध्यान के अंधकार में चुपचाप। फिर आता है निर्वाण — न कोई बंधन, न कोई नाम, बस अस्तित्व का हल्का-सा कंपन, जहाँ शिव स्वयं भी शिव को खो देते हैं। और अंत में, शिव लौटते हैं — शब्द कुन में, जहाँ "ॐ" की पहली स्पंदना होती है। वे बसते हैं वहाँ, जहाँ भावनाएँ शब्द नहीं मांगतीं, जहाँ मौन ही मन्त्र है, और शब्द ही उनका घर बन जाता है।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
