उसकी लिखी चिट्ठी
आज फिर उन चिट्ठियों में तुम्हें ढूंढ रहा था, शायद ये कागज़ ही तुम्हारा हाल बता दें। लगता है, अर्शे बीत गए उन्हें निहारे हुए, मन व्याकुल है, और सीने में हलचल सी। पर न जाने क्यों रुठी हैं मुझसे, जैसे तुम रुठा करती थी उन दिनों। आंखों में गुस्से के बौछार, पर होंठों पे नर्मी कुछ ऐसे ही रूठी हैं। लेकिन, यादों के बस्ते में सहेज कर रखा हूं उन्हें, जब जब खुद को अकेला पाता हूं, तो दो चार बातें कर लिया करता हूं। जो अधूरे अल्फ़ाज़ तुमसे जाते जाते कहने थे, वो अरमान मेरे सिमट के रह गए। खैर सात साल चार महीने इक्कीस दिन.. हो गए। वक्त ने चिट्ठियों का रंग भी चुरा लिया है, लेकिन उनमें लिखे वो शब्द आज भी मुझे दबी आवाज़ में बुलाते हैं। और मैं बावला बन फिर फिर इन्हें पढ़ता हूं, इस आस में की उसकी बिखरी यादें समेट लूं। — Bipul
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