मन
खाली खाली दहलीज़े है खाली से है ये घर आंगन मेरा तेरा किसका है यह नहीं बता पाता है मन बारिश भी बरस गई है भीगा नहीं मगर जरा भी ऐसे क्यों ये सूख गया.... बातो मे भी बाते ना थी ऐसा कैसा बेगानापन दूर कहीं से कोई गुजरा आहट से गुलज़ार हो गया अब तक था बेजान अकेला इन्द्रधनुष से भरा गगन।।
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