गरीब दिल से अमीर।
"मनुष्य धनो से अमीर, पर इंसानियत से गरीब। " गरीब! क्या कहें गरीबी में; रहते हैं छोटे से झोपड़े में- बिना घर के आंगन में - कई बार सड़कों में। दिन की शुरुआत इस उम्मीद पर की खाएं दो रोटी अपने महन्त मजदूरी पर, रोटी मिले सुकुन से इसका कोई- विधान नहीं, पैरों पर रोज़ छाले पड़े इसका कोई ऊपाई नहीं। औरत फूंके चूल्हा, सर पर लांदे मटका लंबी कतार में खड़े होकर- करें इंतजार। जब पहुंचे नल के पास, भरा सिर्फ आधा जल, चलाएं उसे पूरे दिन। साड़ी के छेद से दिखी, सुखी लकड़ियां - जलाएं चूल्हा भले गर्म से , जले उंगलियां। ना दवा खरीदने के लिए, पैंट के फटे जेब में चिल्लर, कैसी है ये लाचारी। बच्चों के तन पर फटी कमीज़, गर्मी में झुलस कर - घूमें दिन भर सड़कों पर, स्कूल जाने के उम्र में, घूमते थे गलियों में, कुछ खाने की तलाश में। मिल जाए कुछ काम तो- पेट भरने की खुशी में, आ जाती थी समझदारी और जिम्मेदारी। पुस्तक में गुजरने वाले दिन, बन जाते होश संभालने वाले रात। देखी इतनी करीबी की, सरदी गुजरे बिना कंबल के गर्मी में। फिर भी होते दिल के अमीर , क्योंकि ना उन्हें कुछ खोने गम था। "काले धन से अच्छा, सुखी रोटी का मिठास था, बेचैन नींद से अच्छा, मच्छरों का गान था।"
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