मर्द...
कुसूर कर बैठा हूं मैं, बन कर मर्द इस ज़माने में, बड़े मज़े में नज़र आता है ये ज़माना, नापाक मर्दों को ठहराने में, जिस्मों हया के पर्दे में, क्या औरत ग़लत कभी हो नहीं सकती, क्यों मर्दों पर ही अक्सर उठाई जाती हैं उंगलियां, क्या औरत भी कभी आपा अपना खो नहीं सकती? बेबुनियादी उसूलों के बोझ तले मर्द, सुबूत अपने बेगुनाही का सिर्फ उसे ही क्यों देना है? इल्जामों से लिपटे तमाम अनचाहे तोहफ़े सारे, एक मर्दों को ही क्यों लेना है? सवालों के कटघरे में अक्सर, नज़र ये मर्द ही क्यों आते हैं, क्या सिर्फ मर्दों से ही शिकवा शिकायत होती है ज़माने को, क्या गलत सिर्फ मर्द ही नज़र आता है? सुन मां मुझ पर करना तू इक एहसान ज़रा, अगली ज़िंदगी अपनी कोख में ही सौंप देना मुझे मेरी कज़ा, कि इस ज़माने को जैसे मर्दों की अब ज़रूरत ही नहीं, मानो ये मर्दानगी ही बन बैठी हो आज मेरे गुनाह मेरी सज़ा, सज़ा भी ऐसी जिसकी वजह मुझे पता ही नहीं, साबित करने की फ़िराक में नापाक मुझे, मेरे अपनों ने ही ना किया कभी मुझ पर यकीं, औरतों की वकालत को ये ज़माना हुआ मशरूफ इस कदर, कि हक़ अपनी वकालत का मर्दों को अब जैसे रहा ही नहीं, पलकों पर दो बूंद झूठे आंसुओं के देख औरत को, मर्दों को बेगुनाह फिर कभी किसी ने माना ही नहीं, बस कुछ खोखले इल्ज़ाम लगे मर्द पर, और बन बैठा मर्द ऐसा गुनेहगार, जिसकी माफ़ी भी शायद बस वो खुदा ही दे, बाकि तो अब किसी की परवाह ही नहीं। ©अल्पदेव
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