मौन
तुम पढ़ लेते हो मुझे, किसी खुली किताब की तरह, मेरे चेहरे पर लिखे हर दबे ख़्वाब की तरह। तुम्हारे सामने आते ही, मैं खुद को खो देती हूँ, जैसे कोई कोरा कागज़, तुम्हारी स्याही में भिगो देती हूँ। सब कुछ साफ़ है, कुछ भी तो छुपा नहीं, पर इन लबों से कभी कुछ, खुलकर कहा नहीं। चाहती हूँ कहना की 'मोहब्बत है तुमसे', 'जरूरत हो तुम', पर डरती हूँ कि कहीं टूट न जाए ये जादुई सुकून। जब मेरी रूह की हर परत, तुम्हारे सामने निहत्थी है, तो क्यों शब्दों की ये रस्म, आज भी इतनी कच्ची है? अगर तुम पढ़ सकते हो मुझे, मेरी हर एक आह को, तो क्यों ढूंढते हो आवाज़ में, मेरे दिल की राह को? मत मांगो मुझसे अल्फाज़, मैं शायद कह न पाऊँगी, इन आँखों में डूबोगे, तो हकीकत समझ जाओगे। मेरी नजरों में लिखा है वो सब, जो जुबां तक नहीं आता, पढ़ लो मुझे... कि अब ये मौन ही हमारा नाता। जो तूम पढ़ सकते हो मुझे, तो फिर क्यों लफ्ज़ों का सवाल है? अगर मेरी आँखों के कोनों में, तुझे अपनी परछाई दिखती है, अगर मेरी धड़कनों की लय, तुम्हारे ही नाम से लिखती है, तो क्यों इंतज़ार है तुम्हे, कि मैं मुकम्मल इकरार करूँ? क्यों ज़रूरी है कि चीख कर, मैं मोहब्बत का इज़हार करूँ? पढ़ लो मेरी जुकती हुई पलकों को इनमें सब कुछ बयां है, तूम मेरा वजूद, मेरी ज़रूरत, और मेरा सारा जहाँ है। अब आवाज़ की उम्मीद न रख, मैं खामोशी में ही मिलूँगी, तूम पढ़ते रहो मुझे... मैं तुम्हारी आँखों में ही खिलूँगी।
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