छंद-- कुण्डलिया
शीर्षक-- सपना 1 सपना जो भी देखना, हो प्राप्ति का प्रयास। कहीं तनिक चूको नहीं, करना तुम यूँ खास।। करना तुम यूँ खास, सतत कर उत्तम ऐसा। करो तनिक न विचार,मिलेगा प्रतिफल वैसा।। काँटे होंगे फूल, सुगम हो अवसर अपना। रहो सदा रत कार्य, पूर्ण सब होगा सपना।। 2 सपना देखो रात में, दिन में उसे न भूल। उसपर करना तुम अमल, बने जिंदगी फूल।। बने जिंदगी फूल, लगेगा जगत सुहाना। रखो समय का ख्याल, करो मत तनिक बहाना ।। जीवन कर अनुकूल, धैर्य मत खोना अपना। करो ढंग से कार्य , सत्य तब होगा सपना।। 3 सपने में मैं डर गया, लगा तीव्र आघात। बैठ गई मन भीति तब, काँपे थर-थर गात।। काँपे थर-थर गात, मुझे यूँ लगा सताने। आशंका ली घेर, हृदय भय लगा समाने।। साहस दें अब ईश, सुखी हों सारे अपने। तुम्हें नवाऊँ शीश, खुशी हिय भर दें सपने।। नरेंद्र सिंह,19.05.2025
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