बूढ़ा ख्वाब
यहाँ एक हृदयस्पर्शी कविता है एक गरीब और लाचार वृद्ध की दशा पर: बूढ़ा ख्वाब एक कोने में पड़ा है बिछौना, जीवन काअब सफर है थका-थका। टूटीचारपाई, फटा तकिया, देह पर बस एक धोतीहै पुरानी सी। चेहरे पे झुर्रियाँ, गहरी रेखाएँ, हर एक मेंदर्द का है इतिहास छुपा। आँखोंमें अब न बची है कोई चमक, बस एक उम्मीद,एक सहारे का इंतज़ार। कभी जो हाथ थे सबका सहारा, आज काँपतेहैं अपने भार से। पैरोंमें अब नहीं पहले जैसी जान, चलनाभी अब मुश्किल हो गया है। खाली हाथ, खाली पेट, खाली जेब, समय कीमार ने सब कुछ छीन लिया। बच्चोंने छोड़ दिया, संगी छोड़ गए, अब तोबस यादें ही हैं साथी। दिन बीतता है भीख के एक टुकड़े पे, रात कटतीहै सितारों से बातें करके। समाज कीनजर में है वो बोझ, पर अंदर सेअब भी नहीं टूटा है। उम्र का ढलान, गरीबी का साया, फिर भीदिल में एक आस है बसी। कभीतो कोई आएगा, पूछेगा, बूढ़ेके इस घाव पर मरहम लगाएगा। --- कविता का सार (Summary of the Poem): यह कविताएक गरीब और लाचार वृद्ध व्यक्ति की मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा, उसके एकांत और परित्यक्त जीवन, और उसकी बुनियादी जरूरतों के लिए छटपटाहट को दर्शाती है। यह समाज के उस वर्ग की ओर ध्यान खींचती है जो उम्र के इस पड़ाव में भी गरिमा और थोड़े से सहारे की渴望 (इच्छा) रखता है।
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