संघर्ष
ख्वाब चाहे जितने बना लो सबकुछ किस्मत में नहीं ।। गिर गिर के सबकुछ है जीते हारना तेरे बस में नहीं ।। तप तप कर बढ़े इंसान यहां तपना सबके बस में नहीं ।। कब ये संघर्ष विराम लगेगा पग पग चलते थकते नहीं ।। लक्ष्य जटिल अभी दूर है लेकिन विश्राम अभी निकट नहीं ।। क्यों इतना भटका रही तेरा कोई सीधा रास्ता नहीं ।। क्यों बिखरी बिखरी है तू तू क्यों संभलती नहीं ।। उम्मीद की सांसों में बंधी उम्र का कुछ पता नहीं ।। हर पल तुझको याद किया है क्यों तुझे कुछ फर्क पड़ता नहीं ।। पूछा प्रिय कौन हो तुम नाम ये जिंदगी बता रही ।।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
