प्रेम समर्पण
तुम आ ही गई,मेरे करीब,मेरे पास,थामने मेरा हाथ देखो न मेरी तो जिंदगी ही थम गई,रुक गई मेरी सांस तुमसे कहता था न,मुझे मौका दे दो,फिर से एक बार तुम ने सुनी नहीं मेरी,नहीं किया,तुमने पुनर्विश्वास आज तुम सामने खड़ी हो,और देखो अब सोया हूं मैं आज आंखों में आंसू है तुम्हारे,अब तक बहुत रोया हूं मैं तुम्हारे लिए हर पल,की है प्रतीक्षा,किया है भरोसा उम्मीद जगाए रखा उस भयानक रजनी के बाद वो रजनी तो बीत गई,ये सुबह सुहानी आई है जिसका इंतज़ार किया,वो मेरे सामने आई है पर उसके सम्मुख हो कर भी,मैं उसे दिखाई ना दूंगा राख दिखेगी उसको मेरी,मैं अग्नि में जल जाऊंगा मेरे जीवन की यात्रा अनंत,एक चिर निद्रा में बदल गई मणिकर्णिका से वो मेरी राखें ले कर चली गई उसने किया श्रृंगार,राख से मेरी,मांग को सजा लिया बना लिया विधवा का वेश,उसने मुझको अपना लिया अस्सी से कहानी शुरू हुई थी, मणिकर्णिका पे अंजाम मिला प्रेमी तन तो नहीं मिले,पर प्रेम,समर्पण पूर्ण हुआ....। – उत्पल
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