युग युग की बात है
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: ✍🏻 निशांत सोनवाने दो मुट्ठी चावल खाकर जिसने दो लोग दे डाले। मिट्टी के बर्तन को भी हीरो सा कर डालें। तीन लोग का स्वामी होकर मित्रता पर झुकता है। अपने आंसुओं से वह निर्धन ब्राह्मण के पैर को ढोता है। इस कलयुग के मेले में मैं सतयुग कहां से लाऊं। हे माधव में इस कलयुग में राम कहां से लाऊं , सुदामासा ना एक मिले कान्हा कौरवों से हजार है । बता इस अन्याय में न्याय कहां से लाऊं। अधर्म बड़ा इस धरती पर मैं धर्म कहां से लाऊं। यु रचा दुनिया तूने मैं उपदेश कहां से लाऊं। अब मुरली की वाणी है कान्हा की पारी है। श्री कृष्णा कहते हैं। की कर्म तुम्हारा कल होगा वो आज नहीं तो कल होगा। कर्म तुम्हारा बने काल । तो क्या करोगे ना कर गंगा के धाम। मेरी बात सुन लो रे अर्जुन एक बात बतलाता हूं । अधर्म के युग मे धर्म को मैं लाता हूं। अर्जुन मेरी गाथा सुन द्वापर युग भी काफी था । कौरवों का भी साथी था। महाभारत में खून सना काफी था। ताड़का, पुतना से असुरानी थे । नरकासुर और कालिया भी हकलाये थे। आगे कान्हा जी कहते हैं! हे अर्जुन तुम राम बानो । सुदामा सा यार बनो ,महाज्ञानी विकराल बनो और गीता का सार पढ़ो, मेरे उपदेश हजार पढ़ो।। ....................................
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