ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ
तुम ने जब ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ (बिखरे बाल) को सँवारा होगा सदक़ा-ए-हुस्न (सुंदरता की भेंट) घटाओं ने उतारा होगा आप की चश्म-ए-करम (मेहरबान आँखें) का जो इशारा होगा औज (चरम/उच्चता) पर मेरे मुक़द्दर का सितारा होगा संग-दिल (पत्थर-दिल) तेरे भी आँसू निकल आए होंगे डूबने वाले ने जब तुझ को पुकारा होगा मैं ने इल्ज़ाम ख़ुशी से लिए सब अपने सर आप बदनाम हूँ ये किस को गवारा होगा कुछ तो क़िस्मत की है साज़िश मिरी बर्बादी में और कुछ उन की भी नज़रों का इशारा होगा क्या ग़रज़ (लाभ/स्वार्थ) उस को ज़माने की ख़ुशी से 'दानिश' यार का ग़म ही जिसे जान से प्यारा होगा
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