खामोशी और चाँद
लबों पर ताला है, यादों का पहरा है, उसकी खामोशी का समंदर बहुत गहरा है। दुनिया की शोर-शराबे से वो थक सी गई है, अब तन्हाई में ही उसने अपना घर ढूँढा है। वो चुपचाप झरोखे पर बैठी रहती है, बिना कहे ही वो सब कुछ कहती है। ज़माना समझता है कि वो अकेली है, मगर वो तो चाँद के संग पहेलियाँ बुनती है। उसकी आँखों में एक अजब सी चमक है, जैसे रूह में चाँदनी की ही महक है। वो बोलती नहीं, बस निहारती है आसमां को, मानो चाँद ही समझता हो उसके हर अरमां को। लोग कहते हैं उसे 'चुप', वो 'खामोश' नहीं, वो तो बस सितारों की बातें सुनने में मग्न है कहीं। वो बैठी रहती है उसी एक खामोशी में, जहाँ उसकी आँखें चाँद से गुफ़्तगू करती हैं।
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