रे मनवा !
क्या मिलना क्या बिछुड़ना क्या वियोगी शोक मनाना ये तो अपरिपक्व भावना हैं अदृश्य मानसिक प्रताड़ना है। सफर में कितने मिलते बिछुड़ते एक समय तक ही साथ निभाते भले ही यात्रा कितना रूचिकर हो समाप्ति पर सभी अपने ही घर जाते । कोई कब कहां रुकता है किसी के लिए हर रिश्ता टूट जाता है अपना समय लिये कभी काल कभी हम कभी गलतफहमियां कभी हंसी से कभी दुखी से उनको विदा किए । पर मन है कि मानता नहीं स्मृतियों में ढूंढता उनकी छवी सच स्वीकारने का साहस नहीं मन तड़पता स्मृतियों में ही कहीं । न राम न बुद्ध न ईशू मोहम्मद रहे सब भूलोक से रिश्ता तोड़ गोलोक बसे भक्त तरसते है उनके दर्शन को आज भी कहां छुटता है लगाव बिछुड़ने के बाद भी। रे मनवा ! सच को तुम क्यों नहीं करते स्वीकार संताप की अग्नि में झुलसाते बारंबार ब्रह्मांड का सारा ज्ञान है निहित तुझमें करते नहीं क्यों उचित व्यवहार फिर भी।
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