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मरने से पहले एक दिन एक खत लिखूंगी,लिखूंगी की जिंदगी बहुत खूबसूरत थी,जीना चाहती थी मैं हर लम्हा हर सांस पूरी शिद्दत से महसूस करना चाहती थी मगर कुछ जख्म ऐसे थे जो वक्त के साथ और गहरे होते गए,कुछ ख्वाब ऐसे थे जो आंखों में ही दफन हो गए।लोगों की बेबसी तन्हाइयां और अंदर का खालीपन सब कुछ निगल गया,और अब मैं थक गई हु जीना चाहती थी मगर हार गई। मेरा बचपन कब वीरान हो गया पता ही नहीं चला कब मैं खुद के दुःख खुद से ही छुपाने लगी ये समझ ही नही आया और जब समझ आया तो बहुत देर हो चुकी थी। अब तो न वक्त बचा है और न ही जीने की चाह ,अगर कुछ रह गया तो बस दर्द, तकलीफ,सूनापन, और खामोशी। सब छूट गया जैसे हथेली से फिसलती रेत नफ़रत सी होने लगी खुद से रोना जैसे भूल सी गई,रोने का मन करता तो भी हसी आ जाती समझ नहीं आ रहा किसको तस्सली दिला रही थी। छोड़ो,अब तो सब ठीक हो ही जाएगा जब मैं........😌
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