जज्बात
क्यों दिल से अब भी उनकी मोहब्बत नहीं जाती, कोशिश की बदल जाए फितरत नहीं जाती। जाहिर करें या रोकें जज्बात गहर में, पर कहने की कमजर्फ सी हसरत नहीं जाती। जुंबिश जबान ले या खामोश ही रहे, सह लें या तड़पें फिर भी मलामत नहीं जाती। करते हैं नेकनीयती की लाख नुमाइश, दिल के किसी कोने से वहशत नहीं जाती। उनके रहम से ही तो जिंदा है अब तलक, बस आदतन जहान की नफरत नहीं जाती। रमन 9 अगस्त 2025 शाम 6:50
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
