मायाजाल
इंसान खुद से भागता आज घिरा हुआ है माया जाल में कोई समझ नहीं पाता क्यों ये खेल जगत में इस मन का खुद से ही खुद की जंग हर रोज लड़ता है हर कोई समझ न आता जीते कैसे क्या गलत और क्या सही जब सत्य और पाप हैं एक ही देह में कैसे पहचाने सत्य असत्य एक कहता है तू रुक जा थम जा ठहर जा सुन मेरी बात को, दूजे को न फर्क इसकी कहता जो होगा देखा जाएगा असत्य सत्य पर हावी होता माया का बढ़ता प्रकोप धीरे धीरे सब नष्ट हो रहा मनुज सोचता रह जाता आज
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
