मिट्टी में महक
क्या? सब एक दिन ऐसे ही खत्म हो जाता है— हाँ, तुम्हारी कोशिशें, तुम्हारी ख़्वाहिशें, यहाँ तक कि तुम्हारा अस्तित्व भी एक सुबह की धुंध की तरह चुपचाप घुल जाएगा समय में। जैसे रेत में खिंची लकीर एक अनसुनी लहर में खो जाती है, जैसे सांझ उतरते ही सूरज अपना सुनहरा वस्त्र उतार देता है। शायद यही सौंदर्य है— कि मिटने से पहले पूरा जीना है, अपने हर सपने को आख़िरी सांस तक थामे रहना है, ताकि जब मौन आए, वो तुम्हें मुस्कुराते हुए पाए। देखो, जैसे फूल झर कर मिट्टी में समा जाते हैं, पर उनकी खुशबू हवा के पंखों पर दूर तक बहती है। तुम भी एक दिन चले जाओगे, पर तुम्हारी हंसी, तुम्हारे शब्द किसी के दिल की गहराई में लौ की तरह टिमटिमाते रहेंगे। इसलिए मिटने से पहले अपने शब्दों को अर्थ दो, अपने होने को वजह दो, ताकि अंत में खालीपन नहीं, बस एक अधूरी-सी मुस्कान रह जाए। और जब समय अपनी आख़िरी दस्तक देगा, तो यूँ महसूस हो जैसे जीवन को थामकर तुमने उसकी हर धड़कन सुनी हो। कि आँसुओं में भी मिठास थी, हार में भी सीख, और हर बिछड़न के भीतर एक नई राह का बीज छुपा था। तब तुम्हें डर नहीं लगेगा मिटने से, क्योंकि तुम जानोगे— तुम लकीर नहीं, बल्कि वो हवा हो जो मिट्टी में अपनी महक छोड़ जाती है। --आलोक ❤️
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