उम्मीद
ये जो कल की धुंध है, न जाने क्या लाएगी, कभी खामोश डराएगी, कभी उम्मीद जगाएगी। हाथों की लकीरें भी अक्सर सवाल करती हैं, मंजिल मिलेगी या बस रास्तों में उम्र ढल जाएगी? ठहराव या बहाव? नैया बीच भँवर में है, किनारा दूर है कितना? किस्मत का ये सिक्का, हवा में चूर है कितना? आज जो मुट्ठी में है, वो कल रेत सा फिसलेगा, अनजानी डगर पर चलने का, ये दस्तूर है कितना? एक अनकहा डर सन्नाटे की चादर तले, एक आहट सी होती है, खोने की घबराहट में, हर शाम रोती है। पर क्या पता उस अंधेरे के ठीक उस पार, एक ऐसी सुबह हो, जो आज से भी हसीन होती है? स्वीकार का साहस अनिश्चितता ही तो जीवन का असली रंग है, बिना इसके तो हर कहानी बेजान, बेरंग है। जो तय है वो तो अंत है, जो अनकहा है वही जीवन, चलो इसी उलझन में जीते हैं, यही तो उमंग है।
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