🌼 लड़की, तुम बोलने से क्यों ड
तुम चुप-चुप सी रहती हो, ऐसा क्या सोचती हो? मैं कह दूँ कुछ ग़लत, तो फिर भी तुम क्यों चुप रहती हो? पढ़ना है तुम्हें — ये बात सच है, तो माँ-पापा से बोलने में क्यों डरती हो? उड़ना चाहती हो बहुत ऊँचा, पर ऊँचाई से क्यों डरती हो? किसने कहा तुम्हें कि तुम ख़ूबसूरत नहीं लगती? तुम खुद को प्यार से देखो — तुम तो "सुप्रिया" लगती हो। हैं ख्वाब बहुत तुम्हारे, तो उन्हें अपनाने से क्यों डरती हो? कविताएँ, नृत्य, लेखन — ये सब क्यों लिखती हो? अच्छा! यही ख्वाब हैं तुम्हारे? तो फिर लड़की, तुम बोलने से क्यों डरती हो? बोलो सबको खुलकर, तुम क्यों डरी-सहमी रहती हो? कहना है बहुत कुछ, तो "हूँ", "हाँ", "हंजी" कहकर बात क्यों ढकती हो? उठो प्रिया, तुम यक़ीन करो — सब कुछ कर सकती हो। नृत्य, लेखन — तुम शादी के बाद भी ये सब कर सकती हो।🌹
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